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Saturday, September 13, 2014

कुर्बतों मे भी जुदाई के ज़माने मांगे

कुर्बतों मे भी जुदाई के ज़माने मांगे,
दिल वो बीमार की रोने के बहाने मांगे.

अपना ये हाल के ज़ी हार चूके लूट भी चूके,
और मुहब्बत वही अंदाज पुराने मांगे.

हम ना होते तो किसी और के चर्चे होते,
खलकते-शहर तो कहने को फ़साने मांगे.

दिल किसी हाल पे माने ही नहीं ज़ाने-फ़राज’,
मिल गये तुम भी तो क्या और ना ज़ाने मांगे.
-अहमद फ़राज

Monday, September 1, 2014

उस ने सुकूते-शब़ में भी अपना पयाम रख दिया

उस ने सुकूते-शब़ में भी अपना पयाम रख दिया,
हिज्र की रात बाम पर माहे-तमाम रख दिया.

आमदे-दोस्त की नाविद कूए-वफा में आम थी,
मैंने भी इक चिराग-सा दिल सरे-शाम रख दिया.

देखो ये मेरे ख्वाब थे देखो ये मेरे जख्म हैं,
मैने तो सब हिसाबे-ज़ान बर-सरे-आम रख दिया.

उस ने नजर नजर मे ही ऐसे भले सुखन कहे,
मैने तो उस के पाँवो में सारा कलाम रख दिया.

शिद्दते-तिश्नगी मे भी गैरते-मैक़शी रही,
उस ने जो फेर ली नज़र मैने भी ज़ाम रख दिया.

और फ़राज चाहिए कितनी मुहब्बतें तुझे,
के माँओ ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया.

-अहमद फ़राज

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं,
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं.

सुना है रब्त है उस को खराब हालों से,
सो अपने आप को बरबाद करके देखते हैं.

सुना है दर्द कि गाहक है चश्मे-नाजुक उसकी,
सो हम भी उस की गली से गुजर कर देखते हैं.

सुना है बोले तो बातों से फुल झड़ते हैं,
ये बात है तो चलो बात करके देखते हैं.

सुना है रात उसे चांद ताकता रहता है,
सितारे बामे-फ़लक से उतर कर देखते हैं.

सुना है हश्र हैं उसकी गज़ाल सी आँखे,
सुना है उसको हिरन दश्त भर के देखते हैं.

सुना है दिन को उसे तितलीयाँ सताती हैं,
सुना है रात को जुगनु ठहर के देखते हैं.

अब उस के शहर में ठहरें की कुछ कर जाएँ,
फ़राजआओ सितारे सफर के देखते हैं.

-अहमद फ़राज

Welcome to My blog

Just got inspired by Pratul sir and created my own blog. Quite a medium to express urself.