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Monday, September 1, 2014

कहां रोना है मुझे दीदा-ए-पुरनम समझता है

कहां रोना है मुझे दीदा-ए-पुरनम समझता है,
मैं मौसम को समझता हूँ मुझे मौसम समझता है.

ज़बां दो चाहने वालों को शायद दूर कर देगी,
मैं बंगला कम समझता हूँ वो उर्दू कम समझता है.

हमारे हाल से सब चाहने वाले हैं नावाकिफ,
मगर एक बेवफा है जो हमारा ग़म समझता है.

मुहब्बत करने वाला जां कि परवा नही करता,
वो अपने पाँव कि जंजीर को रेशम समझता है.

कहाँ तक झील मे पानी रहे आँखे समझती हैं,
कहाँ तक जख़्म को भरना है मरहम समझता है.

- मुनव्वर राणा

Welcome to My blog

Just got inspired by Pratul sir and created my own blog. Quite a medium to express urself.