Showing posts with label Rahat Indori. Show all posts
Showing posts with label Rahat Indori. Show all posts

Monday, September 1, 2014

जितने अपने थे सब पराये थे

जितने अपने थे, सब पराये थे,
हम हवा को गले लगाए थे.

जितनी कसमे थी, सब थी शर्मिंदा,
जितने वादे थे, सर झुकाये थे.

जितने आंसू थे, सब थे बेगाने,
जितने मेहमां थे, बिन बुलाए थे.

सब किताबें पढ़ी-पढ़ाई थीं,
सारे किस्से सुने-सुनाए थे.

एक बंजर जमीं के सीने में,
मैने कुछ आसमां उगाए थे.

सिर्फ दो घूंट प्यास कि खातिर,
उम्र भर धूप मे नहाए थे.

हाशिए पर खड़े हूए है हम,
हमने खुद हाशिए बनाए थे.

मैं अकेला उदास बैठा था,
सामने कहकहे लगाए थे.

है गलत उसको बेवफा कहना,
हम कौन सा धुले-धुलाए थे.

आज कांटो भरा मुकद्दर है,
हमने गुल भी बहुत खिलाए थे.
-
डॉ राहत इंदौरी

इंतेजामात नये सिरे से संभाले जायें

इंतेजामात नये सिरे से संभाले जायें,
जितने कमज़र्फ हैं महफिल से निकाले जायें.

मेरा घर आग कि लपटों मे छिपा है लेकिन,
जब मज़ा है तेरे आंगन मे रौशनी जाये.

गम सलामत है तो पीते ही रहेंगे लेकिन,
पहले मयख़ाने की हालत संभाली जाये.

खाली वक्तों में कहीं बैठ के रो लें यारों,
फुरसतें हैं तो समन्दर ही खंगाले जायें.

खाक मे यूँ ना मिला जब्त की तौहीन ना कर,
ये वो आंसू हैं जो दुनिया को बहा ले जायें.

हम भी प्यासे हैं ये एहसास तो हो साक़ी को,
खाली शीशे हीं हवाओं मे उछाले जायें.

आओ शहर मे नए दोस्त बनायें राहत,
आस्तिनों में चलो सांप ही पाले जायें.

- डॉ राहत इंदौरी

Welcome to My blog

Just got inspired by Pratul sir and created my own blog. Quite a medium to express urself.