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Monday, September 1, 2014

लहू ना हो तो क़लम तर्जुमा नही होता

लहू ना हो तो क़लम तर्जुमा नही होता,
हमारे दौर में आंसू जुबां नही होता.

जहां रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा,
किसी चिराग़ का अपना मकां नही होता.

ये किस मक़ाम पर लाई है मेरी तन्हाई,
के मुझ से आज कोई बद़गुमा नही होता.

मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगा,
किसी चिराग़ के बस में धुंआ नही होता.

वसीमसदियों की आँखों से देखिए मुझको,
वो लफ्ज़ हूँ जो कभी दास्तां नही होता.

-वसीम बरेलवी

हजार कांटो से दामन छुड़ा लिया मैंने

हजार कांटो से दामन छुड़ा लिया मैंने,
अना (अहंकार) को मार के सब कुछ बचा लिया मैंने.

जहाँ भी जाऊँ नजर मे हूँ एक जमाने की
ये कैसा खुद को तमाशा बना लिया मैंने.

अंधेरे बीच मे आ जाते इससे पहले ही
दीया तुम्हारे दीये से जला लिया मैंने.

अज़ीम थे ये दुआओं को उठने वाले हाथ,
ना जाने कब उन्हे कासा (भिक्षापात्र) बना लिया मैंने.

जले तो हाथ, मगर हाँ हवा के हमले से,
किसी चिराग़ की लौ को बचा लिया मैंने.

तराशना ही था हीरा तो मेरा तेरा क्या
किसी भी राह का पत्थर उठा लिया मैंने.

-वसीम बरेलवी

Welcome to My blog

Just got inspired by Pratul sir and created my own blog. Quite a medium to express urself.