Monday, September 1, 2014

कैसे मानू के जमाने की खबर रखती है

कैसे मानू के जमाने की खबर रखती है,
गर्दिशे-वक्त तो बस मुझपे नज़र रखती है.
मेरे पैरों की थकन रुठ ना जाना मुझसे,
एक तू ही तो मेरा राज़े-सफर रखती है.

धूप मुझको जो लिए फिरती है साये-साये,
है तो आवारा, मगर ज़ेहन मे घर रखती है.
दोस्ती तेरे दरख्तों मे हवाएँ भी नही,
दुश्मनी अपने दरख्तों मे समर रखती है.

सफर माना मेरा जारी नही है,
मगर हिम्मत अभी हारी नही है.
बुजुर्गों से मुआफ़ी चाहता हूँ,
किसी के बस की सरदारी नही है.

फजां मे हर तरफ चीखें हैं ताहिर,
किसी बच्चे की किलकारी नही है.
सफर माना मेरा जारी नही है,
मगर हिम्मत अभी हारी नही है.

-ताहिर फ़राज

Wednesday, January 22, 2014

Welcome to My blog

Just got inspired by Pratul sir and created my own blog. Quite a medium to express urself.